Wednesday, 30 March 2016

राम भरत प्रेम



राम भरत प्रेम 
श्री राम लक्ष्मण व सीता सहित चित्रकूट पर्वत की ओर जा रहे थे ! राह बहुत पथरीली और कंटीली थी ! सहसा श्री राम के चरणों में एक कांटा चुभ गया !फलस्वरूप वह रूष्ट या क्रोधित नहीं हुए, बल्कि हाथ जोड़कर धरती से एक अनुरोध करने लगे ! 

पापमोचनी एकादशी वत कथा विधि


पुराणों के अनुसार चैत्र कृष्ण पक्ष की एकादशी पाप मोचिनी है  अर्थात पाप को नष्ट करने वाली. 
पाप मोचनी एकादशी के विषय में भविष्योत्तर पुराण में विस्तार से वर्णन किया गया है। इस व्रत में भगवान विष्णु के चतुर्भुज रूप की पूजा की जाती है।
          एकादशी व्रत की विधि जान्ने के लिए क्लिक करिये. 

Monday, 28 March 2016

वट सवित्री व्रत कथा ,'बरा बरसात' ,बड़ सायत पूजा

वट सवित्री व्रत का महत्त्व

वट वृक्ष के नीचे सावित्री ने अपने पति को पुन: जीवित किया था। तब से यह व्रतवट सावित्रीके नाम से जाना जाता है।ज्येष्ठ मास की अमावस्या को वट-सावित्री की पूजा की जाती हैइसमें वट वृक्ष की पूजा की जाती है। महिलाएं अखण्ड सौभाग्य एवं परिवार की समृद्धि के लिए यह व्रत करती हैं। 




तीर्थो में पंचवटी का महत्त्व है। पांच वटों से युक्त स्थान को पंटवटी कहा गया है। अगस्त्य के परामर्श से श्रीराम ने सीता लक्ष्मण के साथ वनवास काल में यहां निवास किया था। वट वृक्ष दीर्घकाल तक अक्षय रहता है। अक्षय सौभाग्य तथा निरंतर अभ्युदय की प्राप्ति के लिए वट वृक्ष की आराधना की जाती है।

Sunday, 27 March 2016

देवी त्रिपुर भैरवी

देवी त्रिपुर भैरवी







                     “ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नमः”

माँ त्रिपुर भैरवी कंठ में मुंड माला धारण किये हुए हैं. माँ ने अपने हाथों में माला धारण कर रखी है. माँ स्वयं साधनामय हैं उन्होंने अभय और वर मुद्रा धारण कर रखी है जो भक्तों को सौभाग्य प्रदान करती है. माँ ने लाल वस्त्र धारण किया है, माँ के हाथ में विद्या तत्व है. माँ त्रिपुर भैरवी की पूजा में लाल रंग का उपयोग किया जाना लाभदायक है. शत्रु संहार एवं तीव्र तंत्र बाधा निवारण के लिए भगवती त्रिपुरभैरवी महाविद्या साधना अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।

Friday, 25 March 2016

दुर्गा बीज मन्त्र --

दुर्गा बीज मन्त्र --

ॐ हीं  दुं दुर्गायै नामः

दुर्गा वैदिक मन्त्र --
ॐ दुर्गति हरिणी दुर्गा जय जय
काल विनाशिनी काली जय जय
उमा राम ब्रहाणी जय जय
राधा सीता रुक्मिणी जय जय ।।


दुर्गा गायत्री मन्त्र --

ॐ दुर्गा देव्यै च विद्महे शिव पत्न्यै ।
च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ।।


,श्री दुर्गासप्तशती के समस्त मंत्र अगाध शक्तियों से पूर्ण हैं। सिद्ध श्री दुर्गा बीसा यंत्र माँ के भक्तों के लिए अति विशेष एवं उपयोगी यंत्र है ,दुर्गा बीसा यंत्र को प्रतिदिन पूर्ण श्रद्धा से नमस्कार करके माँ से अपने सौभाग्य की प्रार्थना करने से भक्तों पर माँ की सदैव विशेष अनुकम्पा बनी रहती है ,उन्हें जीवन में हर क्षेत्र में सफलता, ज्ञान, अनंत वैभव, यश और कीर्ति की प्राप्ति होती है । माँ के भक्तों को किसी भी प्रकार के रोग एवं व्याधियों का सामना नहीं करना पड़ता है उनके परिवार में हमेशा मंगलमयी, प्रेम और उल्लास का वातावरण बना रहता है  माँ के भक्त इस संसार के समस्त सुख और वैभवों को भोग करते हुए लम्बी आयु प्राप्त करते है और अंत में स्वर्ग को प्राप्त होते है ।

बाजनामठ बटुक भैरव

बम बम बम
शिव के 11 अवतार हैं। इन्हीं में से एक है बटुक भैरव, अन्य रूपों की तरह ही महादेव का ये स्वरूप भक्तों की पुकार सुनने में तनिक भी देरी नहीं करता। जबलपुर स्थित बाजनामठ में बटुक भैरव के दर्शन होते हैं। देश का दुर्लभ तांत्रिक मंदिर है। 
             बाजनामठ मंदिर जबलपुर

राम जी और शंकर जी का युद्ध

राम जी और शंकर जी का युद्ध

बात उन दिनों कि है जब श्रीराम का अश्वमेघ यज्ञ चल रहा था. श्रीराम के अनुज शत्रुघ्न के नेतृत्व में असंख्य वीरों की सेना सारे प्रदेश को विजित करती जा रही थी. यज्ञ का अश्व प्रदेश प्रदेश जा रहा था. इस क्रम में कई राजाओं के द्वारा यज्ञ का घोड़ा पकड़ा गया लेकिन अयोध्या की सेना के आगे उन्हें झुकना पड़ा. शत्रुघ्न के अलावा सेना में हनुमान, सुग्रीव और भरत पुत्र पुष्कल सहित कई महारथी उपस्थित थे जिन्हें जीतना देवताओं के लिए भी संभव नहीं था. कई जगह भ्रमण करने के बाद यज्ञ का घोडा देवपुर पहुंचा जहाँ राजा वीरमणि का राज्य था. राजा वीरमणि अति धर्मनिष्ठ तथा श्रीराम एवं महादेव के अनन्य भक्त थे. उनके दो पुत्र रुक्मांगद और शुभंगद वीरों में श्रेष्ठ थे. राजा वीरमणि के भाई वीरसिंह भी एक महारथी थे. राजा वीरमणि ने भगवान शंकर की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया था और महादेव ने उन्हें उनकी और उनके पूरे राज्य की रक्षा का वरदान दिया था. महादेव के द्वारा रक्षित होने के कारण कोई भी उनके राज्य पर आक्रमण करने का साहस नहीं करता था.

दुर्गा सप्तशती

दुर्गा सप्तशती का विधिपूर्वक किया गया पाठ जीवन में अन्न, धन, वस्त्र, यश, शौर्य, शांति और मनवांछित फल प्रदान करता है। विशेषकर, नवरात्र में पहले दिन कलश स्थापना के बाद दुर्गा सप्तशती के तेरह अध्यायों का पाठ करने का विधान है। जिस मनुष्य को एक दिन में पूरे पाठ करने का अवसर न मिले, तो वह एक दिन केवल मध्यम चरित्र का तथा दूसरे दिन शेष दो चरित्रों का पाठ कर सकता है।

प्रतिदिन पाठ करने वाले मनुष्य एक दिन में पूरा पाठ न कर पाएं, तो वे एक, दो, एक, चार, दो, एक और दो अध्यायों के क्रम से सात दिनों में पाठ पूरा कर सकते हैं। संपूर्ण दुर्गासप्तशती का पाठ न करने वाले मनुष्य देवी कवच, अर्गलास्तोत्र, कीलकम का पाठ करके देवी सूक्तम पढ़ सकते हैं।

Friday, 18 March 2016

आमलकी एकादशी ,रंग ग्यारस

युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा : श्रीकृष्ण ! मुझे फाल्गुन मास के शुक्लपक्ष की एकादशी का नाम और माहात्म्य बताने की कृपा कीजिये ।

भगवान श्रीकृष्ण बोले: महाभाग धर्मनन्दन ! फाल्गुन मास के शुक्लपक्ष की एकादशी का नाम ‘आमलकी’ है । इसका पवित्र व्रत विष्णुलोक की प्राप्ति करानेवाला है । राजा मान्धाता ने भी महात्मा वशिष्ठजी से इसी प्रकार का प्रश्न पूछा था, जिसके जवाब में वशिष्ठजी ने कहा था : 
आमलकी यानी आंवला को शास्त्रों में उसी प्रकार श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है जैसा नदियों में गंगा को प्राप्त है और देवों में भगवान विष्णु को।

51 शक्तिपीठ

हिन्दू धर्म के अनुसार जहां सती देवी के शरीर के अंग गिरे, वहां वहां शक्ति पीठ बन गईं। ये अत्यंय पावन तीर्थ कहलाये। ये तीर्थ पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर फैले हुए हैं।

पुराणों के अनुसार

सती के शव के विभिन्न अंगों से बावन शक्तिपीठो का निर्माण हुआ था। इसके पीछे यह अंतर्पंथा है कि दक्ष प्रजापति ने कनखल (हरिद्वार) में 'बृहस्पति सर्व' नामक यज्ञ रचाया। उस यज्ञ में ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और अन्य देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया, लेकिन जान-बूझकर अपने जमाता भगवान शंकर को नहीं बुलाया। शंकरजी की पत्नी और दक्ष की पुत्री सती पिता द्वारा न बुलाए जाने पर और शंकरजी के रोकने पर भी यज्ञ में भाग लेने गईं। यज्ञ-स्थल पर सती ने अपने पिता दक्ष से शंकर जी को आमंत्रित न करने का कारण पूछा और पिता से उग्र विरोध प्रकट किया। इस पर दक्ष प्रजापति ने भगवान शंकर को अपशब्द कहे। इस अपमान से पीड़ित हुई सती ने यज्ञ-अग्नि कुंड में कूदकर अपनी प्राणाहुति दे दी। भगवान शंकर को जब इस का पता चला तो क्रोध से उनका तीसरा नेत्र खुल गया। भगवान शंकर के आदेश पर उनके गणों के उग्र कोप से भयभीत सारे देवता और ऋषिगण यज्ञस्थल से भाग गये। भगवान शंकर ने यज्ञकुंड से सती के पार्थिव शरीर को निकाल कंधे पर उठा लिया और दुःखी हुए इधर-उधर घूमने लगे। सती का शव लेकर शिव पृथ्वी पर विचरण करते हुए तांडव नृत्य भी करने लगे, जिससे पृथ्वी पर प्रलय की स्थिति उत्पन्न होने लगी। पृथ्वी समेत तीनों लोकों को व्याकुल देखकर और देवों के अनुनय-विनय पर भगवान विष्णु सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खण्ड-खण्ड कर धरती पर गिराते गए। जब-जब शिव नृत्य मुद्रा में पैर पटकते, विष्णु अपने चक्र से शरीर का कोई अंग काटकर उसके टुकड़े पृथ्वी पर गिरा देते तदनंतर जहाँ सती के शव के विभिन्न अंग और आभूषण गिरे, वहाँ बावन शक्तिपीठो का निर्माण हुआ। अगले जन्म में सती ने हिमवान राजा के घर पार्वती के रूप में जन्म लिए घोर तपस्या कर शिवजी को पुन: पति रूप में प्राप्त किया।


"शक्ति" अर्थात देवी दुर्गा, जिन्हें दाक्षायनी या पार्वती रूप में भी पूजा जाता है।
"भैरव" अर्थात शिव के अवतार, जो देवी के स्वांगी हैं।
"अंग या आभूषण" अर्थात, सती के शरीर का कोई अंग या आभूषण, जो श्री विष्णु द्वारा सुदर्शन चक्र से काटे जाने पर पृथ्वी के विभिन्न स्थानों पर गिरा, आज वह स्थान पूज्य है और शक्तिपीठ कहलाता है।


कामाख्या चालीसा

कामाख्या चालीसा
॥ दोहा ॥ 

सुमिरन कामाख्या करुँ, सकल सिद्धि की खानि । 
होइ प्रसन्न सत करहु माँ, जो मैं कहौं बखानि ॥ 

जै जै कामाख्या महारानी । दात्री सब सुख सिद्धि भवानी ॥ 
कामरुप है वास तुम्हारो । जहँ ते मन नहिं टरत है टारो ॥ 

Tuesday, 15 March 2016

होलाष्टक

होलिका दहन के आठ दिन पूर्व होलाष्टक लग जाता है. इसके अनुसार होलाष्टक लगने से होली तक कोई भी शुभ संस्कार संपन्न नहीं किए जाते.16 संस्कार जैसे नामकरण संस्कार, जनेऊ संस्कार, गृह प्रवेश, विवाह संस्कार जैसे शुभ कार्यों पर रोक लग गई है. ये शुभ कार्य धुलेण्डी के बाद ही शुरू होंगे. 

यह भी मान्यता है कि होली के पहले के आठ दिनों अष्टमी से लेकर पूर्णिमा तक प्रहलाद को काफी यातनाएं दी गई थीं. यातनाओं से भरे उन आठ दिनों को ही अशुभ मानने की परंपरा बन गई. हिन्दू धर्म में किसी भी घर में होली के पहले के आठ दिनों में शुभ कार्य नहीं किए जाते.

होलाष्टक का संबंध भगवान विष्णु के भक्त प्रहलाद व उनके पिता अत्याचारी हिरण्यकश्यप की कथा से है. स्कंद पुराण के अनुसार राक्षसी प्रवृत्ति के राजा हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु से ईर्ष्या व जलन की भावना रखता था. उसके राज्य में जो कोई भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करता था उसे मौत की सजा सुनाई जाती थी. राजा के फरमान से डरकर उसके राज्य में कोई भी भगवान विष्णु की पूजा नहीं करता था.

कथा प्रसंग के अनुसार राजा हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रहलाद भगवान विष्णु का भक्त था. अपने पुत्र प्रहलाद की विष्णु भक्ति के बारे में जब राजा को पता चला तो उसने प्रहलाद को समझाया मगर प्रहलाद ने भगवान विष्णु की भक्ति करनी नहीं छोड़ी. इससे क्रोधित होकर राजा ने अपने पुत्र को मृत्युदंड की सजा सुनाई.

राजा के आदेश पर सैनिकों ने भक्त प्रहलाद को अनेक यातनाएं दीं. उसे मरने के लिए जंगली जानवरों के बीच छोड़ा, नदी में डुबो दिया, ऊंचे पर्वत से भी फेंका गया. हर सजा पर प्रहलाद भगवान की कृपा से बच गया. अंत में राजा ने अपनी बहन होलिका की गोद में बिठाकर प्रहलाद को जिंदा जला डालने का हुक्म दिया.

राजा की बहन होलिका को वरदान था कि वह अग्नि में भी भस्म नहीं होगी. प्रभु कृपा से प्रहलाद तो बच गया मगर होलिका जल गई. उस दिन से होलिका दहन की परंपरा शुरू हुई.

सिद्ध गणेश मंदिर जबलपुर

 सिद्ध गणेश मंदिर जबलपुर


भगवान के दर पर जाकर हर किसी की कोई न कोई मनोकामना होती है,कोई धन समृद्धि,सुख,शांति,कोई विद्या पाने की प्रार्थना करता है. 
संस्कारधानी जबलपुर के ग्वारीघाट माँ नर्मदा के तट पर स्थित स्वयं भू सिद्ध गणेश एक ऐसा मंदिर है जहां लोग अपनी मन्नत पूरी करने के 
लिए अर्जियां लगाते है जो प्रतिमा खुदाई के दौरान प्राप्त हुई थी वह 
गर्भगृह में है। जिनके दर्शन करना भक्त सौभाग्यकारी मानते हैं।

 इस मंदिर में भगवान श्री गणेश अपनी पत्नी रिद्धि और सिद्धि के साथ निवास करते हैं। एक कागज के टुकड़े में अपनी मन्नत लिखकर नारियल में बांध दी जाती हैं। ये भगवान श्रीगणेश को अर्पित होती हैं। बताया जाता है कि ये यहां की बरसों की परंपरा है। ऐसा करने पर कभी कोई खाली हाथ नहीं जाता। भक्तों की करुण पुकार लंबोदर तक जरूर पहुंचती है। भक्तों की मनोकामना पूरी होने पर भक्त पुनः भगवान के दर्शन के लिए आते है. 
नारियल में अर्जियां लगाने वाले लाखों भक्तों के लाखों नारियल भी यहां एकत्रित हो जाते हैं। अन्य मंदिरों या पूजन की तरह इन नारियलों का प्रसाद वितरित नहीं किया जाता, बल्कि अनंत चतुर्दशी के दिन इनका हवन कर दिया जाता है। इस दिन लाखों भक्त गणपति के दर्शनों और हवन में शामिल होने एकत्रित होते हैं।

     

Monday, 14 March 2016

शिवजी के १७ मंत्र

 शिवजी के १७ मंत्र 
हर मासिक शिवरात्रि को सूर्यास्‍त के समय दिया जलाकर अपने गुरुदेव का स्मरण करके शिवजी का स्मरण करते करते ये 17 मंत्र बोलें । ‘जो शिव है वो गुरु है, जो गुरु है वो शिव है’इसलिये गुरुदेव का स्मरण करते है । 


१) ॐ शिवाय नम:
२) ॐ सर्वात्मने नम:
३) ॐ त्रिनेत्राय नम:
४) ॐ हराय नम:
५) ॐ इन्द्र्मुखाय नम:
६) ॐ श्रीकंठाय नम:
७) ॐ सद्योजाताय नम:
८) ॐ वामदेवाय नम:
९) ॐ अघोरह्र्द्याय नम:
१०) ॐ तत्पुरुषाय नम:
११) ॐ ईशानाय नम:
१२) ॐ अनंतधर्माय नम:
१३) ॐ ज्ञानभूताय नम:
१४) ॐ अनंतवैराग्यसिंघाय नम:
१५) ॐ प्रधानाय नम:
१६) ॐ व्योमात्मने नम:
१७) ॐ युक्तकेशात्मरूपाय नम: 

उक्‍त मंत्र बोलकर अपने इष्ट को, गुरु को प्रणाम करके  शिव गायत्री मंत्र बोलें– 

ॐ तत्पुरुषाय विद्महे  महादेवाय धीमहि, तन्नो रूद्र प्रचोदयात् || 

                         शिवजी को प्रणाम 


कनकधारा यंत्र ,स्तोत्रम्


कनकधारा यंत्र :

धन प्राप्ति के लिए हरसंभव श्रेष्ठ उपाय करना चाहते हैं। धन प्राप्ति और धन संचय के लिए पुराणों में वर्णित कनकधारा यंत्र एवं स्तोत्र चमत्कारिक रूप से लाभ प्रदान करते हैं। इस यंत्र की विशेषता भी यही है कि यह किसी भी प्रकार की विशेष माला, जाप, पूजन, विधि-विधान की माँग नहीं करता बल्कि सिर्फ दिन में एक बार इसको पढ़ना पर्याप्त है।

साथ ही प्रतिदिन इसके सामने दीपक और अगरबत्ती लगाना आवश्यक है। अगर किसी दिन यह भी भूल जाएँ तो बाधा नहीं आती क्योंकि यह सिद्ध मंत्र होने के कारण चैतन्य माना जाता है।
माँ लक्ष्मी की प्रसन्नता के लिए जितने भी यंत्र हैं, उनमें कनकधारा यंत्र तथा स्तोत्र सबसे ज्यादा प्रभावशाली एवं अतिशीघ्र फलदायी है।    : अपार धन प्राप्ति और धन संचय के लिए कनकधारा स्तोत्र का पाठ करने से लाभ प्राप्त होता है।


                                                     
 ।। श्री कनकधारा स्तोत्रम् ।।


अंगहरे पुलकभूषण माश्रयन्ती भृगांगनैव मुकुलाभरणं तमालम।
अंगीकृताखिल विभूतिरपांगलीला मांगल्यदास्तु मम मंगलदेवताया:।।1।।
* जैसे भ्रमरी अधखिले कुसुमों से अलंकृत तमाल-तरु का आश्रय लेती है, उसी प्रकार जो प्रकाश श्रीहरि के रोमांच से सुशोभित श्रीअंगों पर निरंतर पड़ता रहता है तथा जिसमें संपूर्ण ऐश्वर्य का निवास है, संपूर्ण मंगलों की अधिष्ठात्री देवी भगवती महालक्ष्मी का वह कटाक्ष मेरे लिए मंगलदायी हो।।1।।
मुग्ध्या मुहुर्विदधती वदनै मुरारै: प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि।
माला दृशोर्मधुकर विमहोत्पले या सा मै श्रियं दिशतु सागर सम्भवाया:।।2।।
* जैसे भ्रमरी महान कमल दल पर मँडराती रहती है, उसी प्रकार जो श्रीहरि के मुखारविंद की ओर बराबर प्रेमपूर्वक जाती है और लज्जा के कारण लौट आती है। समुद्र कन्या लक्ष्मी की वह मनोहर मुग्ध दृष्टिमाला मुझे धन संपत्ति प्रदान करे ।।2।।

विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षमानन्द हेतु रधिकं मधुविद्विषोपि।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्द्धमिन्दोवरोदर सहोदरमिन्दिराय:।।3।।
* जो संपूर्ण देवताओं के अधिपति इंद्र के पद का वैभव-विलास देने में समर्थ है, मधुहन्ता श्रीहरि को भी अधिकाधिक आनंद प्रदान करने वाली है तथा जो नीलकमल के भीतरी भाग के समान मनोहर जान पड़ती है, उन लक्ष्मीजी के अधखुले नेत्रों की दृष्टि क्षण भर के लिए मुझ पर थोड़ी सी अवश्य पड़े।।3।।


आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दमानन्दकन्दम निमेषमनंगतन्त्रम्।
आकेकर स्थित कनी निकपक्ष्म नेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजंगरायांगनाया:।।4।।

* शेषशायी भगवान विष्णु की धर्मपत्नी श्री लक्ष्मीजी के नेत्र हमें ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हों, जिनकी पुतली तथा बरौनियाँ अनंग के वशीभूत हो अधखुले, किंतु साथ ही निर्निमेष (अपलक) नयनों से देखने वाले आनंदकंद श्री मुकुन्द को अपने निकट पाकर कुछ तिरछी हो जाती हैं।।4।।

बाह्यन्तरे मधुजित: श्रितकौस्तुभै या हारावलीव हरिनीलमयी विभाति।
कामप्रदा भगवतो पि कटाक्षमाला कल्याण भावहतु मे कमलालयाया:।।5।।


* जो भगवान मधुसूदन के कौस्तुभमणि-मंडित वक्षस्थल में इंद्रनीलमयी हारावली-सी सुशोभित होती है तथा उनके भी मन में प्रेम का संचार करने वाली है, वह कमल-कुंजवासिनी कमला की कटाक्षमाला मेरा कल्याण करे।।5।।

कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर्धाराधरे स्फुरति या तडिदंगनेव्।
मातु: समस्त जगतां महनीय मूर्तिभद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनाया:।।6।।


* जैसे मेघों की घटा में बिजली चमकती है, उसी प्रकार जो कैटभशत्रु श्रीविष्णु के काली मेघमाला के श्यामसुंदर वक्षस्थल पर प्रकाशित होती है, जिन्होंने अपने आविर्भाव से भृगुवंश को आनंदित किया है तथा जो समस्त लोकों की जननी है, उन भगवती लक्ष्मी की पूजनीय मूर्ति मुझे कल्याण प्रदान करे।।6।




प्राप्तं पदं प्रथमत: किल यत्प्रभावान्मांगल्य भाजि: मधुमायनि मन्मथेन।
मध्यापतेत दिह मन्थर मीक्षणार्द्ध मन्दालसं च मकरालयकन्यकाया:।।7।।

* समुद्र कन्या कमला की वह मंद, अलस, मंथर और अर्धोन्मीलित दृष्टि, जिसके प्रभाव से कामदेव ने मंगलमय भगवान मधुसूदन के हृदय में प्रथम बार स्थान प्राप्त किया था, यहाँ मुझ पर पड़े।।7।।

दद्याद दयानुपवनो द्रविणाम्बुधाराम स्मिभकिंचन विहंग शिशौ विषण्ण।
दुष्कर्मधर्ममपनीय चिराय दूरं नारायण प्रणयिनी नयनाम्बुवाह:।।8।।

* भगवान नारायण की प्रेयसी लक्ष्मी का नेत्र रूपी मेघ दयारूपी अनुकूल पवन से प्रेरित हो दुष्कर्म (धनागम विरोधी अशुभ प्रारब्ध) रूपी धाम को चिरकाल के लिए दूर हटाकर विषाद रूपी धर्मजन्य ताप से पीड़ित मुझ दीन रूपी चातक पर धनरूपी जलधारा की वृष्टि करे।।8।।

इष्टा विशिष्टमतयो पि यथा ययार्द्रदृष्टया त्रिविष्टपपदं सुलभं लभंते।
दृष्टि:प्रहूष्टकमलोदर दीप्ति रिष्टां पुष्टि कृषीष्ट मम पुष्कर विष्टराया:।।9।।

* विशिष्ट बुद्धि वाले मनुष्य जिनके प्रीति पात्र होकर जिस दया दृष्टि के प्रभाव से स्वर्ग पद को सहज ही प्राप्त कर लेते हैं, पद्मासना पद्मा की वह विकसित कमल-गर्भ के समान कांतिमयी दृष्टि मुझे मनोवांछित पुष्टि प्रदान करे।।9।।

गीर्देवतैति गरुड़ध्वज भामिनीति शाकम्भरीति शशिशेखर वल्लभेति।
सृष्टि स्थिति प्रलय केलिषु संस्थितायै तस्यै नमस्त्रि भुवनैक गुरोस्तरूण्यै ।।10।।
जो सृष्टि लीला के समय वाग्देवता (ब्रह्मशक्ति) के रूप में विराजमान होती है तथा प्रलय लीला के काल में शाकम्भरी (भगवती दुर्गा) अथवा चन्द्रशेखर वल्लभा पार्वती (रुद्रशक्ति) के रूप में अवस्थित होती है, त्रिभुवन के एकमात्र पिता भगवान नारायण की उन नित्य यौवना प्रेयसी श्रीलक्ष्मीजी को नमस्कार है।।10।।

श्रुत्यै नमोस्तु शुभकर्मफल प्रसूत्यै रत्यै नमोस्तु रमणीय गुणार्णवायै।शक्तयै नमोस्तु शतपात्र निकेतानायै पुष्टयै नमोस्तु पुरूषोत्तमवल्लभायै ।।11।।

* मात:। शुभ कर्मों का फल देने वाली श्रुति के रूप में आपको प्रणाम है। रमणीय गुणों की सिंधु रूपा रति के रूप में आपको नमस्कार है। कमल वन में निवास करने वाली शक्ति स्वरूपा लक्ष्मी को नमस्कार है तथा पुष्टि रूपा पुरुषोत्तम प्रिया को नमस्कार है।।11।।

नमोस्तु नालीक निभाननायै नमोस्तु दुग्धौदधि जन्म भूत्यै ।
नमोस्तु सोमामृत सोदरायै नमोस्तु नारायण वल्लभायै।।12।।

* कमल वदना कमला को नमस्कार है। क्षीरसिंधु सभ्यता श्रीदेवी को नमस्कार है। चंद्रमा और सुधा की सगी बहन को नमस्कार है। भगवान नारायण की वल्लभा को नमस्कार है। (12)

सम्पतकराणि सकलेन्द्रिय नन्दानि साम्राज्यदान विभवानि सरोरूहाक्षि।
त्व द्वंदनानि दुरिता हरणाद्यतानि मामेव मातर निशं कलयन्तु नान्यम् ।।13।।
* कमल सदृश नेत्रों वाली माननीय माँ! आपके चरणों में किए गए प्रणाम संपत्ति प्रदान करने वाले, संपूर्ण इंद्रियों को आनंद देने वाले, साम्राज्य देने में समर्थ और सारे पापों को हर लेने के लिए सर्वथा उद्यत हैं, वे सदा मुझे ही अवलम्बन दें। (मुझे ही आपकी चरण वंदना का शुभ अवसर सदा प्राप्त होता रहे)।।13।।

यत्कटाक्षसमुपासना विधि: सेवकस्य कलार्थ सम्पद:।
संतनोति वचनांगमानसंसत्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे।।14।।
* जिनके कृपा कटाक्ष के लिए की गई उपासना उपासक के लिए संपूर्ण मनोरथों और संपत्तियों का विस्तार करती है, श्रीहरि की हृदयेश्वरी उन्हीं आप लक्ष्मी देवी का मैं मन, वाणी और शरीर से भजन करता हूँ।।14।।

सरसिजनिलये सरोज हस्ते धवलमांशुकगन्धमाल्यशोभे।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम्।।15।।

* भगवती हरिप्रिया! तुम कमल वन में निवास करने वाली हो, तुम्हारे हाथों में नीला कमल सुशोभित है। तुम अत्यंत उज्ज्वल वस्त्र, गंध और माला आदि से सुशोभित हो। तुम्हारी झाँकी बड़ी मनोरम है। त्रिभुवन का ऐश्वर्य प्रदान करने वाली देवी, मुझ पर प्रसन्न हो जाओ।।15।।

दग्धिस्तिमि:कनकुंभमुखा व सृष्टिस्वर्वाहिनी विमलचारू जल प्लुतांगीम।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष लोकाधिनाथ गृहिणी ममृताब्धिपुत्रीम्।।16।।

* दिग्गजों द्वारा सुवर्ण-कलश के मुख से गिराए गए आकाश गंगा के निर्मल एवं मनोहर जल से जिनके श्री अंगों का अभिषेक (स्नान) संपादित होता है, संपूर्ण लोकों के अधीश्वर भगवान विष्णु की गृहिणी और क्षीरसागर की पुत्री उन जगज्जननी लक्ष्मी को मैं प्रात:काल प्रणाम करता हूँ।।16।।

कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूरतरां गतैरपाड़ंगै:।
अवलोकय माम किंचनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयाया : ।।17।।

* कमल नयन केशव की कमनीय कामिनी कमले!
मैं अकिंचन (दीन-हीन) मनुष्यों में अग्रगण्य हूँ, अतएव तुम्हारी कृपा का स्वाभाविक पात्र हूँ। तुम उमड़ती हुई करुणा की बाढ़ की तरह तरंगों के समान कटाक्षों द्वारा मेरी ओर देखो।।17।।

स्तुवन्ति ये स्तुतिभिर भूमिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम्।
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो भवन्ति ते बुधभाविताया:।।18।।

* जो मनुष्य इन स्तुतियों द्वारा प्रतिदिन वेदत्रयी स्वरूपा त्रिभुवन-जननी भगवती लक्ष्मी की स्तुति करते हैं, वे इस भूतल पर महान गुणवान और अत्यंत सौभाग्यशाली होते हैं तथा विद्वान पुरुष भी उनके मनोभावों को जानने के लिए उत्सुक रहते हैं।।18।।

इति श्री कनकधारा स्तोत्रं सम्पूर्णम



                                     

Sunday, 13 March 2016

श्री हनुमान की उपासना का मंत्र

शास्त्रों में हनुमान की 'अतुलितबलधामं' कहकर भी वंदना की गई है। दरअसल, इस महिमा में उनके वज्र के समान शरीर मात्र ही नहीं बल्कि श्री हनुमान की बुद्धि और विद्या रूपी शक्तियों के स्वामी होने की ओर भी संकेत है। 
यही कारण है कि श्री हनुमान की उपासना तन, मन और धन हर तरह से पुख्ता यानी शक्तिशाली और मजबूत बनाने वाली मानी गई है। क्योंकि हनुमान भक्ति से एकाग्र और शुद्ध मन, तन को पुष्ट कर पुरुषार्थ के रूप में अर्थ सुख का फल देने वाला होता है।

 तन, मन और धन से संपन्न बनने की कामना को ही पूरा करने के लिए शास्त्रों में श्री हनुमान की उपासना का विशेष मंत्र बहुत ही असरदार माना गया है। जिसे मंगलवार या शनिवार को श्री हनुमान की पंचोपचार पूजा व आरती यानी सिंदूर, गंध, अक्षत, धूप, दीप व नैवेद्य द्वारा संपन्न कर, स्मरण करना मंगलकारी व संकटमोचक होता है। यह मंत्र है -


                   ऊँ नमो हनुमते रुद्रावतराय वज्रदेहाय
                   वज्रनखाय वज्रसुखाय वज्ररोम्णे
                   वज्रनेत्राय वज्रदन्ताय वज्रकराय
                   वज्रभक्ताय रामदूताय स्वाहा।

              

स्वयं सिद्ध मन्त्र


स्वयं सिद्ध मन्त्र 
ॐ श्री राम दूताय नमः 

यह हनुमान जी का पंचाक्षरी मन्त्र है जो की स्वयं सिद्ध है। श्री हनुमान जी के इस मन्त्र में स्थित ॐ के माध्यम से पर ब्रह्मा परमात्मा की कृपा, श्री के माध्यम से श्री लक्ष्मी अर्थात माता जानकी जी की कृपा, राम के माध्यम से श्री हनुमान जी के प्रिय श्री रामजी की कृपा प्राप्त होती है। जब भक्त इस मन्त्र का जप करते है तब श्री हनुमान जी इस मंत्र के माध्यम से हमारी पुकार सुनकर हमारे शरीर में सर्व शक्तियों के साथ विराजमान हो जाते है। श्री हनुमान जी श्री राम के परम भक्त एवं सेवक है इसलिए अपने नाम दूताय के पूर्व अपने प्रभु श्री राम का स्मरण सुन कर श्री हनुमान जी अत्यन्त प्रसन्न होते है और मन्त्र के माध्यम से हमारी पुकार सुन कर तुंरत इस बात का संदेश अपने प्रभु श्री राम को देते है। प्रभु श्री राम भी अपने परम भक्त श्री हनुमान के मुख से संदेश सुन कर अति प्रसन्न होते है और भक्त पर अपनी विशेष कृपा दृष्टि बरसाते है क्योंकि भगवान श्री राम की यह नीति है की उन्हें अपने सेवक के सेवक अति प्रिय होते है।


                              

सूर्य नमस्कार

सूर्य नमस्कार करने से मन शांत और प्रसन्न होता है... सूर्य नमस्कार के 

बारह स्थितियों या चरणों में इन बारह मंत्रों का उचारण जाता है। प्रत्येक 

मंत्र में सूर्य का भिन्न नाम लिया जाता है। हर मंत्र का एक ही सरलअर्थ 

है- सूर्य को (मेरा) नमस्कार है।

* ॐ सूर्याय नम: ।

* ॐ भास्कराय नम:।

* ऊं रवये नम: ।

* ऊं मित्राय नम: ।

* ॐ भानवे नम:

* ॐ खगय नम: ।

* ॐ पुष्णे नम: ।

* ॐ मारिचाये नम: ।

* ॐ आदित्याय नम: ।

* ॐ सावित्रे नम: ।

* ॐ आर्काय नम: ।

* ॐ हिरण्यगर्भाय नम: ।


                                                                                

Friday, 11 March 2016

कहानी भगवान के भोले भक्त, धन्ना की

भक्त धन्ना जी का  जन्म मुंबई के पास धुआन गाँव में एक जाट घराने में हुआ| आप के माता पिता कृषि और पशु पालन करके अपना जीवन यापन करते थे| वह बहुत निर्धन थे| जैसे ही धन्ना बड़ा हुआ उसे भी पशु चराने के काम में लगा दिया| वह प्रतिदिन पशु चराने जाया करता। 


गाँव के बाहर ही कच्चे तालाब के किनारे एक ठाकुर द्वार था जिसमे बहुत सारी ठाकुरों की मूर्तियाँ रखी हुई थी| लोग प्रतिदिन वहाँ आकर माथा टेकते व भेंटा अर्पण करते| धन्ना पंडित को ठाकुरों की पूजा करते, स्नान करवाते व घंटियाँ खड़काते रोज देखता| अल्पबुद्धि का होने के कारण वह समझ न पाता| एक दिन उसके मन में आया कि देखतें हैं कि क्या है| उसने एक दिन पंडित से पूछ ही लिया कि आप मूर्तियों के आगे बैठकर आप क्या करते हो? पंडित ने कहा ठाकुर की सेवा करते हैं| जिनसे कि मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं| धन्ने ने कहा, यह ठाकुर मुझे भी दे दो| उससे छुटकारा पाने के लिए पंडित ने कपड़े में पत्थर लपेटकर दे दिया|

श्री बाँकेबिहारी की आरती


श्री बाँकेबिहारी की आरती 
श्री बाँकेबिहारी तेरी आरती गाऊँ।
कुन्जबिहारी तेरी आरती गाऊँ।
श्री श्यामसुन्दर तेरी आरती गाऊँ।
श्री बाँकेबिहारी तेरी आरती गाऊँ॥

मोर मुकुट प्रभु शीश पे सोहे।
प्यारी बंशी मेरो मन मोहे।
देखि छवि बलिहारी जाऊँ।
श्री बाँकेबिहारी तेरी आरती गाऊँ॥

चरणों से निकली गंगा प्यारी।
जिसने सारी दुनिया तारी।
मैं उन चरणों के दर्शन पाऊँ।
श्री बाँकेबिहारी तेरी आरती गाऊँ॥

दास अनाथ के नाथ आप हो।
दुःख सुख जीवन प्यारे साथ हो।
हरि चरणों में शीश नवाऊँ।
श्री बाँकेबिहारी तेरी आरती गाऊँ॥

श्री हरि दास के प्यारे तुम हो।
मेरे मोहन जीवन धन हो।
देखि युगल छवि बलि-बलि जाऊँ।
श्री बाँकेबिहारी तेरी आरती गाऊँ॥

आरती गाऊँ प्यारे तुमको रिझाऊँ।
हे गिरिधर तेरी आरती गाऊँ।
श्री श्यामसुन्दर तेरी आरती गाऊँ।

श्री बाँकेबिहारी तेरी आरती गाऊँ॥
                               

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vivaah sita ram srotra sitaji sitamaata skanda shasti solah somvaar som pradosh vart som tayodashi vart Somanath Mallikarjun Mahankaleshwar Omkareshwar Kedarnath Bhimashankar Vishwanath Tryambakeshwar Vaidyanath Nageshwar Ramesham Grishneshwar somvaar vart somvati amavsaya sraswati prathna Stotra on Sri Ganesha sudama friendship sukra pradosh vart sunderkand sunderkand aavahan visarjan surdaas ke pad sury mantra sury namaskaar sury puja. surya bhavaan surya chhati vrat surya shashti vart swastik swayam sidhh swayambhu sidhya ganesh tana pola bada pola kali marbat teja dashmi til chauth til dwadashi tilak trantrik mandir trayodashi trayodashi vart tripund tripuri purnima tulsi mantra tulsi puja tulsi srotra tulsi vivah TulsiVivah types of puran types of shivling uma maheshwer vart utpanna ekadashi. margsheesh ekadashi uttar kand uttarkand vaibhav lasmi vart vaikunth ekadashi Vaikuntha Chaturdashi vartraaj varuthani ekadashi vat savitri vart vats dwadashi vijya ekadashi vinayak chaturthi 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